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    <title>धाकड़ समाचार &amp; : अंतरिक्ष</title>
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    <description>धाकड़ समाचार &amp; : अंतरिक्ष</description>
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    <dc:rights>Copyright 2026 धाकड़ समाचार    &amp; All Rights Reserved.</dc:rights>
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        <title>राजस्थान परमाणु परियोजना में 700 मेगावाट रिएक्टर की ईंधन लोडिंग शुरू</title>
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        <description><![CDATA[ भारत के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में राजस्थान स्थित एक महत्वपूर्ण परियोजना ने नया चरण पार किया है। NPCIL ने रावतभाटा स्थित RAPP-8 की प्रारंभिक ईंधन लोडिंग शुरू कर दी है। यह प्रक्रिया 19 सितंबर 2026 को शुरू हुई और इसके साथ 700 मेगावाट क्षमता वाले स्वदेशी प्रेसराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर (PHWR) को कमीशनिंग की दिशा में आगे बढ़ाया गया है।
प्रारंभिक ईंधन लोडिंग किसी परमाणु रिएक्टर के कमीशनिंग क्रम का एक महत्वपूर्ण चरण होता है। इसके बाद निर्धारित तकनीकी और सुरक्षा प्रक्रियाओं के तहत रिएक्टर को अगले चरणों की ओर ले जाया जाता है। RAPP-8 के मामले में इसके बाद First Approach to Criticality और फिर बिजली उत्पादन से संबंधित प्रक्रियाएं आगे बढ़ेंगी।
NPCIL के अनुसार, यूनिट-8 को प्रारंभिक ईंधन लोडिंग की अनुमति परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) से निर्धारित पूर्व-शर्तों और सुरक्षा संबंधी मूल्यांकन पूरे होने के बाद मिली। परियोजना के सिस्टम और आवश्यक तैयारियों की समीक्षा के बाद यह चरण शुरू किया गया।
RAPP-8 भारत में विकसित किए जा रहे 700 MWe PHWR डिजाइन की श्रृंखला का हिस्सा है। इससे पहले काकरापार परमाणु विद्युत परियोजना की यूनिट-3 और यूनिट-4 तथा राजस्थान परियोजना की यूनिट-7 इस श्रृंखला में आगे बढ़ चुकी हैं। RAPP-8 इस डिजाइन की 16 प्रस्तावित इकाइयों वाली व्यापक योजना का चौथा रिएक्टर है।
NPCIL के मुताबिक प्रारंभिक ईंधन लोडिंग से वाणिज्यिक संचालन तक सामान्य परिस्थितियों में करीब छह से आठ महीने का समय लग सकता है। इसलिए RAPP-8 के वाणिज्यिक संचालन की दिशा में आगे की गतिविधियां चालू वित्त वर्ष के दौरान जारी रहने की उम्मीद है। हालांकि वास्तविक समय तकनीकी और नियामकीय प्रक्रियाओं पर निर्भर करेगा।
परियोजना के साथ राजस्थान परमाणु स्थल पर भविष्य की इकाइयों की तैयारी भी चल रही है। NPCIL ने यूनिट-9 और यूनिट-10 के लिए जियोटेक्निकल जांच शुरू होने की जानकारी दी है। इसके अलावा देश के अलग-अलग हिस्सों में कई अन्य परमाणु रिएक्टर भी निर्माणाधीन हैं।
परमाणु ऊर्जा भारत के ऊर्जा मिश्रण में निरंतर बिजली उपलब्ध कराने वाले स्रोत के रूप में इस्तेमाल की जाती है। स्वदेशी 700 मेगावाट PHWR डिजाइन की कई इकाइयों को एक समान डिजाइन के आधार पर विकसित करना निर्माण और संचालन में मानकीकरण की दिशा में भी देखा जा रहा है। ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 21 Sep 2026 15:01:37 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Piyush Raghuwanshi</dc:creator>
        <media:keywords>RAPP-8, राजस्थान परमाणु परियोजना, NPCIL, परमाणु ऊर्जा, 700 MW Reactor, PHWR, रावतभाटा, ऊर्जा</media:keywords>
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        <title>ISRO ने EOS&amp;05 उपग्रह को सफलतापूर्वक लॉन्च किया, अंतरिक्ष में भारत की निगरानी क्षमता को मिली बड़ी मजबूती</title>
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        <description><![CDATA[ श्रीहरिकोटा, 4 सितंबर 2026 | भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने शुक्रवार तड़के भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की। श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से GSLV-F17 रॉकेट के जरिए EOS-05 पृथ्वी अवलोकन उपग्रह को सफलतापूर्वक लॉन्च किया गया। रॉकेट ने सुबह 2:55 बजे उड़ान भरी और लगभग 19 मिनट की यात्रा के बाद उपग्रह को उसकी निर्धारित सब-जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में स्थापित किया। यह मिशन भारत की पृथ्वी अवलोकन और अंतरिक्ष आधारित निगरानी क्षमताओं के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। GSLV-F17 की सफल उड़ान
GSLV-F17 भारत के Geosynchronous Satellite Launch Vehicle कार्यक्रम की 19वीं उड़ान है। लगभग 51.7 मीटर ऊंचे इस रॉकेट ने करीब 27.5 घंटे के काउंटडाउन के बाद श्रीहरिकोटा के सेकेंड लॉन्च पैड से उड़ान भरी। प्रक्षेपण के दौरान रॉकेट ने अपने तीन चरणों का इस्तेमाल करते हुए EOS-05 को निर्धारित कक्षा की दिशा में पहुंचाया।
GSLV भारत के महत्वपूर्ण भारी-उपग्रह प्रक्षेपण वाहनों में शामिल है। इसकी खासियत इसका स्वदेशी क्रायोजेनिक अपर स्टेज है, जो भारी उपग्रहों को जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट की दिशा में भेजने में सक्षम बनाता है। EOS-05 मिशन में इसी क्षमता का इस्तेमाल किया गया।
ISRO के अनुसार EOS-05 का वजन लगभग 2,367 किलोग्राम है। यह GSLV द्वारा प्रक्षेपित किए गए सबसे भारी पृथ्वी अवलोकन उपग्रहों में से एक है और इस मिशन की सफलता रॉकेट की क्षमता में हुई तकनीकी प्रगति को भी दर्शाती है। EOS-05 क्या है?
EOS-05 एक अत्याधुनिक Earth Observation Satellite है। इसका मुख्य उद्देश्य अंतरिक्ष से पृथ्वी की सतह की उच्च गुणवत्ता वाली तस्वीरें और महत्वपूर्ण भौगोलिक जानकारी उपलब्ध कराना है।
इस मिशन की सबसे खास बात यह है कि EOS-05 को जियोसिंक्रोनस कक्षा से पृथ्वी का अवलोकन करने के लिए तैयार किया गया है। आम तौर पर कई पृथ्वी अवलोकन उपग्रह पृथ्वी की निचली कक्षाओं में घूमते हैं और अलग-अलग समय पर किसी क्षेत्र के ऊपर से गुजरते हैं। इसके मुकाबले जियोसिंक्रोनस कक्षा में मौजूद उपग्रह पृथ्वी के घूर्णन के साथ तालमेल बनाए रखते हुए किसी खास क्षेत्र की लगातार निगरानी के लिए अधिक उपयोगी हो सकता है।
EOS-05 को लगभग 36,000 किलोमीटर की ऊंचाई वाली परिचालन कक्षा की दिशा में भेजा जाना है। इस तरह की कक्षा से किसी बड़े भौगोलिक क्षेत्र पर लगातार नजर रखना संभव होता है। प्राकृतिक आपदाओं की निगरानी में मदद
EOS-05 का सबसे महत्वपूर्ण उपयोग आपदा प्रबंधन में हो सकता है। भारत जैसे बड़े और भौगोलिक रूप से विविध देश में हर साल बाढ़, चक्रवात, भूस्खलन, जंगलों में आग और अन्य प्राकृतिक आपदाएं सामने आती हैं।
ऐसी परिस्थितियों में जमीन पर मौजूद टीमों के लिए पूरे प्रभावित क्षेत्र की तत्काल जानकारी हासिल करना मुश्किल हो सकता है। अंतरिक्ष से प्राप्त तस्वीरों और डेटा की मदद से प्रभावित क्षेत्रों की पहचान, स्थिति का आकलन और राहत-बचाव की योजना बनाने में सहायता मिल सकती है।
उदाहरण के तौर पर यदि किसी बड़े क्षेत्र में बाढ़ आती है, तो उपग्रह से प्राप्त तस्वीरों के जरिए यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि पानी किन इलाकों तक पहुंचा है, कौन से क्षेत्र ज्यादा प्रभावित हैं और किन इलाकों में राहत कार्यों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
इसी तरह चक्रवात के दौरान समुद्र और तटीय क्षेत्रों की निगरानी तथा आपदा के बाद हुए नुकसान का आकलन करने में भी पृथ्वी अवलोकन डेटा महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
कृषि क्षेत्र के लिए भी महत्वपूर्ण
EOS-05 से मिलने वाला पृथ्वी अवलोकन डेटा केवल आपदा प्रबंधन तक सीमित नहीं रहेगा। पृथ्वी अवलोकन उपग्रहों से मिलने वाली जानकारी का इस्तेमाल कृषि, जल संसाधन, वानिकी, पर्यावरण निगरानी और शहरी नियोजन जैसे क्षेत्रों में भी किया जाता है।
कृषि क्षेत्र में उपग्रह आधारित निगरानी के माध्यम से फसलों की स्थिति, भूमि के उपयोग और बड़े स्तर पर कृषि क्षेत्रों में होने वाले बदलावों का अध्ययन किया जा सकता है।
भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्वपूर्ण स्थान होने के कारण बेहतर पृथ्वी अवलोकन प्रणाली किसानों और नीति निर्माताओं के लिए उपयोगी जानकारी उपलब्ध कराने में मदद कर सकती है। लंबे समय में इस तरह के डेटा का इस्तेमाल कृषि योजना, जल प्रबंधन और प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल के लिए किया जा सकता है।
जल संसाधनों और पर्यावरण की निगरानी
भारत में नदियों, झीलों, जलाशयों और भूजल संसाधनों की निगरानी भी एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है। पृथ्वी अवलोकन उपग्रहों से प्राप्त जानकारी का इस्तेमाल जल संसाधनों से जुड़े बदलावों को समझने में किया जा सकता है।
इसी प्रकार जंगलों और पर्यावरण में होने वाले बदलावों पर भी नजर रखी जा सकती है। जंगलों के क्षेत्र में बदलाव, वनस्पति की स्थिति और बड़े स्तर पर पर्यावरणीय परिवर्तन का अध्ययन करने में उपग्रह आधारित डेटा वैज्ञानिकों और प्रशासन के लिए उपयोगी होता है।
शहरी क्षेत्रों में तेजी से बढ़ते निर्माण और बदलते भूमि उपयोग को समझने के लिए भी Earth Observation तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। इससे भविष्य की शहरी योजना तैयार करने में मदद मिल सकती है।
राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी उपयोगी
EOS-05 की एक अन्य महत्वपूर्ण विशेषता इसकी रणनीतिक उपयोगिता है। पृथ्वी की लगातार निगरानी करने की क्षमता किसी भी देश के लिए महत्वपूर्ण होती है।
उपग्रह से प्राप्त तस्वीरों और डेटा का इस्तेमाल सीमावर्ती क्षेत्रों तथा महत्वपूर्ण रणनीतिक स्थानों की निगरानी में किया जा सकता है। इससे जमीन पर मौजूद एजेंसियों को व्यापक क्षेत्र की जानकारी प्राप्त करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि उपग्रह के कई उपयोग नागरिक और विकास संबंधी हैं, लेकिन इसकी उच्च स्तरीय पृथ्वी अवलोकन क्षमता भारत की समग्र अंतरिक्ष और रणनीतिक क्षमताओं को मजबूत करने वाली मानी जा रही है।
GSLV के लिए भी बड़ी उ ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 04 Sep 2026 20:15:03 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Piyush Raghuwanshi</dc:creator>
        <media:keywords>ISRO EOS-05, GSLV-F17, EOS-05 Launch, ISRO Launch 2026, पृथ्वी अवलोकन उपग्रह, भारत अंतरिक्ष मिशन, श्रीहरिकोटा लॉन्च</media:keywords>
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        <title>इसरो ने अगले पृथ्वी अवलोकन उपग्रह मिशन की तैयारियां तेज कीं</title>
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        <description><![CDATA[ बेंगलुरु। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने अपने अगले पृथ्वी अवलोकन उपग्रह मिशन की तैयारियों को तेज कर दिया है। यह उपग्रह उच्च-रिज़ॉल्यूशन कैमरों और आधुनिक रिमोट सेंसिंग तकनीक से लैस होगा, जिससे मौसम पूर्वानुमान, कृषि निगरानी, जल संसाधन प्रबंधन तथा प्राकृतिक आपदाओं की बेहतर निगरानी संभव होगी।

इसरो के वैज्ञानिकों के अनुसार मिशन का उद्देश्य देश को अधिक सटीक भू-स्थानिक डेटा उपलब्ध कराना है, जिससे बाढ़, सूखा और भूस्खलन जैसी आपदाओं के दौरान राहत एवं बचाव कार्यों में तेजी लाई जा सके। इसके अलावा किसानों को फसल की स्थिति और भूमि उपयोग से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी भी प्राप्त होगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह मिशन भारत की अंतरिक्ष तकनीक को नई मजबूती देगा और पर्यावरण संरक्षण, स्मार्ट कृषि तथा राष्ट्रीय विकास योजनाओं में महत्वपूर्ण योगदान निभाएगा। ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 17 Aug 2026 07:02:17 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Piyush Raghuwanshi</dc:creator>
        <media:keywords>: ISRO, सैटेलाइट, पृथ्वी अवलोकन, अंतरिक्ष मिशन, भारत समाचार</media:keywords>
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