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    <title>धाकड़ समाचार &amp; : विज्ञान</title>
    <link>https://dhakarsamachar.in/rss/category/विज्ञान</link>
    <description>धाकड़ समाचार &amp; : विज्ञान</description>
    <dc:language>HI</dc:language>
    <dc:creator></dc:creator>
    <dc:rights>Copyright 2026 धाकड़ समाचार    &amp; All Rights Reserved.</dc:rights>
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        <title>केदारनाथ में पांच महीनों में 50 टन से ज्यादा कचरा, पिछले साल से ढाई गुना</title>
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        <description><![CDATA[ केदारनाथ धाम में इस वर्ष तीर्थयात्रा के दौरान कचरा प्रबंधन एक महत्वपूर्ण पर्यावरणीय मुद्दा बनकर सामने आया है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार अप्रैल से अगस्त 2026 के पांच महीनों में 50.30 मीट्रिक टन कचरा दर्ज किया गया।
यह मात्रा 2025 के पूरे यात्रा सीजन में दर्ज 21.40 मीट्रिक टन कचरे से 2.5 गुना से अधिक है। 2023 में 32.58 टन और 2024 में 26.10 टन कचरा दर्ज किया गया था।
आंकड़े केदारनाथ नगर पंचायत द्वारा RTI के जवाब में उपलब्ध कराए गए। बढ़ता कचरा हिमालयी क्षेत्र में तीर्थ पर्यटन के पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर चर्चा का विषय है।
केदारनाथ एक संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में स्थित है। यहां कचरा प्रबंधन के लिए संग्रह, परिवहन और निस्तारण की व्यवस्था महत्वपूर्ण है।
तीर्थयात्रियों की संख्या बढ़ने के साथ प्लास्टिक, पैकेजिंग और अन्य ठोस कचरे की मात्रा भी बढ़ सकती है। इसलिए स्थानीय प्रशासन के सामने कचरा प्रबंधन की क्षमता बनाए रखना चुनौती बनी रहती है।
मुख्य बिंदु
अप्रैल-अगस्त 2026 में 50.30 टन कचरा।
2025 के पूरे सीजन से 2.5 गुना से अधिक।
आंकड़े RTI के जरिए सामने आए।
केदारनाथ हिमालयी पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्र है।
कचरा प्रबंधन पर दबाव बढ़ा। ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 25 Sep 2026 23:10:52 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Piyush Raghuwanshi</dc:creator>
        <media:keywords>Kedarnath Waste, Kedarnath Dham, Uttarakhand, Pilgrimage, Environment</media:keywords>
    </item>
    <item>
        <title>कई राज्यों में भारी बारिश का अलर्ट, ओडिशा और आंध्र पर विशेष नजर</title>
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        <description><![CDATA[ सितंबर के अंतिम चरण में देश के कई हिस्सों में मानसूनी गतिविधियां बनी हुई हैं। IMD के अनुसार 22 सितंबर को ओडिशा और आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों में भारी से बहुत भारी बारिश हो सकती है। मौसम विभाग ने बंगाल की खाड़ी के ऊपर कम दबाव का क्षेत्र बनने की संभावना से जुड़ी गतिविधियों पर भी नजर रखी है।
इसके अलावा कर्नाटक, महाराष्ट्र, गुजरात और कुछ अन्य क्षेत्रों में भी बारिश और गरज-चमक की संभावना बताई गई है। दिल्ली में इसके विपरीत मौसम मुख्यतः शुष्क रहने का अनुमान है।
मौसम विभाग के पूर्वानुमान के अनुसार बारिश की गतिविधियां अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग तीव्रता की रह सकती हैं। कुछ स्थानों पर तेज हवाओं और आंधी के साथ बारिश होने की संभावना है।
मानसून की वापसी के चरण में इस तरह की मौसम प्रणालियां स्थानीय स्तर पर बारिश को प्रभावित कर सकती हैं। भारी बारिश वाले क्षेत्रों में जलभराव और यातायात प्रभावित होने जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं।
लोगों को स्थानीय मौसम विभाग और प्रशासन की ओर से जारी चेतावनियों पर ध्यान देने की सलाह दी गई है। विशेष रूप से भारी बारिश की संभावना वाले क्षेत्रों में यात्रा और बाहरी गतिविधियों की योजना मौसम की स्थिति देखकर बनाना उपयोगी रहेगा। ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 23 Sep 2026 00:07:20 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Piyush Raghuwanshi</dc:creator>
        <media:keywords>IMD Rain Alert, भारी बारिश, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, मौसम, मानसून</media:keywords>
    </item>
    <item>
        <title>केरल में भारी बारिश, छह जिलों में ऑरेंज अलर्ट जारी</title>
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        <description><![CDATA[ केरल में दक्षिण-पश्चिम मानसून की सक्रियता के बीच कई हिस्सों में बारिश का दौर जारी है। 21 सितंबर को IMD ने पठानमथिट्टा, अलप्पुझा, कोट्टायम, इडुक्की, एर्नाकुलम और त्रिशूर जिलों के लिए ऑरेंज अलर्ट जारी किया। मौसम विभाग के अनुसार इन इलाकों में कुछ स्थानों पर भारी से बहुत भारी बारिश हो सकती है। साथ ही गरज के साथ बारिश और तेज सतही हवाओं की संभावना भी जताई गई है।
बारिश को देखते हुए राज्य प्रशासन ने जिला स्तर पर निगरानी बढ़ा दी है। रिपोर्ट के अनुसार इडुक्की और कोट्टायम में लोगों को मौसम की स्थिति को लेकर अलर्ट किया गया है। अधिकारियों को संवेदनशील क्षेत्रों की स्थिति पर लगातार नजर रखने और आवश्यकता पड़ने पर लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने की तैयारी रखने को कहा गया है।
पिछले दिनों भी राज्य के कई हिस्सों में तेज बारिश के कारण सामान्य जनजीवन प्रभावित हुआ। कुछ इलाकों में भूस्खलन और अचानक बाढ़ जैसी घटनाओं के बाद प्रशासन ने राहत एवं बचाव तैयारियों को सक्रिय रखा है। मौसम विभाग के अलर्ट के बाद स्थानीय प्रशासन के लिए अगले कुछ घंटे महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार भारी बारिश के दौरान निचले इलाकों, नदी-नालों के आसपास और पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को स्थानीय प्रशासन की चेतावनियों पर ध्यान देना जरूरी है। सड़क यातायात और अन्य स्थानीय सेवाओं पर भी मौसम का असर पड़ सकता है।
राज्य में बारिश की स्थिति को देखते हुए प्रशासन और मौसम विभाग लगातार परिस्थितियों की समीक्षा कर रहे हैं। आने वाले दिनों में बारिश की तीव्रता में बदलाव के आधार पर अलर्ट की स्थिति भी बदली जा सकती है। ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 21 Sep 2026 15:22:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Piyush Raghuwanshi</dc:creator>
        <media:keywords>केरल बारिश, ऑरेंज अलर्ट, IMD, मौसम विभाग, भारी बारिश, बाढ़, मौसम समाचार</media:keywords>
    </item>
    <item>
        <title>राजस्थान परमाणु परियोजना में 700 मेगावाट रिएक्टर की ईंधन लोडिंग शुरू</title>
        <link>https://dhakarsamachar.in/राजस्थान-परमाणु-परियोजना-में-700-मेगावाट-रिएक्टर-की-ईंधन-लोडिंग-शुरू</link>
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        <description><![CDATA[ भारत के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में राजस्थान स्थित एक महत्वपूर्ण परियोजना ने नया चरण पार किया है। NPCIL ने रावतभाटा स्थित RAPP-8 की प्रारंभिक ईंधन लोडिंग शुरू कर दी है। यह प्रक्रिया 19 सितंबर 2026 को शुरू हुई और इसके साथ 700 मेगावाट क्षमता वाले स्वदेशी प्रेसराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर (PHWR) को कमीशनिंग की दिशा में आगे बढ़ाया गया है।
प्रारंभिक ईंधन लोडिंग किसी परमाणु रिएक्टर के कमीशनिंग क्रम का एक महत्वपूर्ण चरण होता है। इसके बाद निर्धारित तकनीकी और सुरक्षा प्रक्रियाओं के तहत रिएक्टर को अगले चरणों की ओर ले जाया जाता है। RAPP-8 के मामले में इसके बाद First Approach to Criticality और फिर बिजली उत्पादन से संबंधित प्रक्रियाएं आगे बढ़ेंगी।
NPCIL के अनुसार, यूनिट-8 को प्रारंभिक ईंधन लोडिंग की अनुमति परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) से निर्धारित पूर्व-शर्तों और सुरक्षा संबंधी मूल्यांकन पूरे होने के बाद मिली। परियोजना के सिस्टम और आवश्यक तैयारियों की समीक्षा के बाद यह चरण शुरू किया गया।
RAPP-8 भारत में विकसित किए जा रहे 700 MWe PHWR डिजाइन की श्रृंखला का हिस्सा है। इससे पहले काकरापार परमाणु विद्युत परियोजना की यूनिट-3 और यूनिट-4 तथा राजस्थान परियोजना की यूनिट-7 इस श्रृंखला में आगे बढ़ चुकी हैं। RAPP-8 इस डिजाइन की 16 प्रस्तावित इकाइयों वाली व्यापक योजना का चौथा रिएक्टर है।
NPCIL के मुताबिक प्रारंभिक ईंधन लोडिंग से वाणिज्यिक संचालन तक सामान्य परिस्थितियों में करीब छह से आठ महीने का समय लग सकता है। इसलिए RAPP-8 के वाणिज्यिक संचालन की दिशा में आगे की गतिविधियां चालू वित्त वर्ष के दौरान जारी रहने की उम्मीद है। हालांकि वास्तविक समय तकनीकी और नियामकीय प्रक्रियाओं पर निर्भर करेगा।
परियोजना के साथ राजस्थान परमाणु स्थल पर भविष्य की इकाइयों की तैयारी भी चल रही है। NPCIL ने यूनिट-9 और यूनिट-10 के लिए जियोटेक्निकल जांच शुरू होने की जानकारी दी है। इसके अलावा देश के अलग-अलग हिस्सों में कई अन्य परमाणु रिएक्टर भी निर्माणाधीन हैं।
परमाणु ऊर्जा भारत के ऊर्जा मिश्रण में निरंतर बिजली उपलब्ध कराने वाले स्रोत के रूप में इस्तेमाल की जाती है। स्वदेशी 700 मेगावाट PHWR डिजाइन की कई इकाइयों को एक समान डिजाइन के आधार पर विकसित करना निर्माण और संचालन में मानकीकरण की दिशा में भी देखा जा रहा है। ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 21 Sep 2026 15:01:37 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Piyush Raghuwanshi</dc:creator>
        <media:keywords>RAPP-8, राजस्थान परमाणु परियोजना, NPCIL, परमाणु ऊर्जा, 700 MW Reactor, PHWR, रावतभाटा, ऊर्जा</media:keywords>
    </item>
    <item>
        <title>मानसून की वापसी शुरू, देश के 43 फीसदी हिस्से में बारिश की कमी</title>
        <link>https://dhakarsamachar.in/मानसून-की-वापसी-शुरू-देश-के-43-फीसदी-हिस्से-में-बारिश-की-कमी</link>
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        <description><![CDATA[ नई दिल्ली, 19 सितंबर 2026। दक्षिण-पश्चिम मानसून ने शनिवार, 19 सितंबर को पश्चिमी राजस्थान के कुछ हिस्सों से वापसी शुरू कर दी। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार मानसून की वापसी सामान्य समय के करीब है। वहीं, देश के करीब 43 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र में अब भी बारिश की कमी दर्ज की गई है। 19 सितंबर तक देशभर में कुल मानसूनी बारिश सामान्य से लगभग 15 प्रतिशत कम रही और संचयी बारिश 695.6 मिलीमीटर दर्ज की गई।
पश्चिमी राजस्थान से वापसी की शुरुआत
IMD के मुताबिक मानसून वापसी की रेखा शनिवार को राजस्थान के रामगढ़, मोहनगढ़, फलोदी और खाजूवाला क्षेत्रों से गुजर रही थी। आने वाले तीन से चार दिनों में राजस्थान के अन्य हिस्सों के साथ पंजाब और कच्छ-सौराष्ट्र के कुछ क्षेत्रों से भी मानसून की वापसी की संभावना जताई गई है।
आमतौर पर मानसून की वापसी 17 सितंबर के आसपास पश्चिमी राजस्थान से शुरू होती है। इस साल इसकी शुरुआत सामान्य तारीख से कुछ दिन के अंतर के साथ हुई है।
कई राज्यों में बारिश की कमी
मानसून सीजन के दौरान देश के कई राज्यों में सामान्य से कम बारिश हुई है। मेघालय में बारिश की कमी 59 प्रतिशत, आंध्र प्रदेश में 43 प्रतिशत, अरुणाचल प्रदेश में 41 प्रतिशत और बिहार में 36 प्रतिशत दर्ज की गई है।
इसके अलावा गोवा, कर्नाटक, केरल, असम, तमिलनाडु, हरियाणा और तेलंगाना में भी सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई। राजस्थान और पंजाब के लिए भी इस मानसून सीजन के अंत तक बारिश की कमी रहने का अनुमान है।
बंगाल की खाड़ी में बना निम्न दबाव
मानसून की वापसी शुरू होने के बीच बंगाल की खाड़ी में एक नया मौसम तंत्र सक्रिय हुआ है। IMD के अनुसार उत्तर अंडमान सागर के ऊपर बना निम्न दबाव क्षेत्र पश्चिम-उत्तर-पश्चिम दिशा में आगे बढ़ सकता है।
इसके 21 सितंबर के आसपास डिप्रेशन और 22 सितंबर के आसपास डीप डिप्रेशन में बदलने की संभावना जताई गई है। इसके बाद यह दक्षिण ओडिशा और उत्तर आंध्र प्रदेश के तट की ओर बढ़ सकता है तथा लगभग 23 सितंबर को तट पार करने की संभावना है।
कई राज्यों में भारी बारिश का अनुमान
नए मौसम तंत्र के प्रभाव से ओडिशा, गंगीय पश्चिम बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़, सिक्किम और तटीय आंध्र प्रदेश में अगले सप्ताह मध्यम से भारी बारिश होने की संभावना है।
इससे उन इलाकों में बारिश की गतिविधियां बढ़ सकती हैं जहां मानसून अभी सक्रिय है। हालांकि बारिश की कमी वाले क्षेत्रों में इसका प्रभाव राज्य और जिले के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।
खेती पर भी असर
मानसून की बारिश का सीधा संबंध खरीफ फसलों की खेती से है। जिन क्षेत्रों में लंबे समय तक बारिश सामान्य से कम रही है, वहां कृषि गतिविधियों और फसल उत्पादन पर असर पड़ने की संभावना बनी हुई है।
इस साल जून, अगस्त और सितंबर में अब तक बारिश सामान्य से नीचे रही, जबकि जुलाई में देशभर की बारिश सामान्य से करीब एक प्रतिशत अधिक थी।
आगे मौसम पर नजर
मानसून की वापसी शुरू होने के बावजूद देश के कई हिस्सों में अभी बारिश की गतिविधियां जारी रहेंगी। बंगाल की खाड़ी में विकसित हो रहा निम्न दबाव क्षेत्र अगले कुछ दिनों में मौसम को प्रभावित कर सकता है।
फिलहाल IMD की निगरानी मानसून की आगे की वापसी और बंगाल की खाड़ी में बन रहे मौसम तंत्र की दिशा पर बनी हुई है। आने वाले दिनों में राज्यों के अनुसार बारिश की स्थिति में बदलाव देखने को मिल सकता है। ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 19 Sep 2026 23:48:03 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Piyush Raghuwanshi</dc:creator>
        <media:keywords>मानसून 2026, मानसून वापसी, IMD, बारिश की कमी, मौसम समाचार, भारत मौसम, सितंबर 2026</media:keywords>
    </item>
    <item>
        <title>अल नीनो तेजी से होगा मजबूत, 2027 तक बढ़ सकता है अत्यधिक गर्मी, बाढ़ और सूखे का खतरा</title>
        <link>https://dhakarsamachar.in/अल-नीनो-तेजी-से-होगा-मजबूत-2027-तक-बढ़-सकता-है-अत्यधिक-गर्मी-बाढ़-और-सूखे-का-खतरा</link>
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        <description><![CDATA[ जिनेवा, 3 सितंबर 2026 | दुनिया के मौसम पर नजर रखने वाली प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संस्था ने चेतावनी दी है कि अल नीनो की स्थिति अब स्थापित हो चुकी है और आने वाले महीनों में यह काफी मजबूत हो सकती है। इसके प्रभाव से वर्षा और तापमान के सामान्य पैटर्न में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। इससे दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बाढ़, सूखा, अत्यधिक गर्मी और अन्य मौसम संबंधी घटनाओं का खतरा बढ़ने की आशंका है।
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार अल नीनो केवल प्रशांत महासागर के तापमान में होने वाला बदलाव नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव दुनिया के कई हिस्सों के मौसम पर पड़ सकता है। समुद्र की सतह के तापमान में असामान्य बढ़ोतरी वातावरण के सामान्य परिसंचरण को प्रभावित करती है और इसके परिणामस्वरूप अलग-अलग क्षेत्रों में बारिश और तापमान का पैटर्न बदल सकता है।
3 सितंबर 2026 को जारी नए मौसम अपडेट में बताया गया कि वर्तमान अल नीनो आने वाले महीनों में और मजबूत होने की संभावना रखता है। इसके प्रभाव 2026 के बाकी हिस्से और 2027 की शुरुआत तक महसूस किए जा सकते हैं। हालांकि इसका असर हर देश और क्षेत्र में एक जैसा नहीं होगा।
क्या है अल नीनो?
अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जो मुख्य रूप से भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह के तापमान के सामान्य से अधिक गर्म होने से जुड़ी होती है।
प्रशांत महासागर पृथ्वी के सबसे बड़े महासागरों में से एक है और इसके तापमान में होने वाले बड़े बदलाव वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण को प्रभावित कर सकते हैं। समुद्र का गर्म पानी हवा और बादलों के बनने की प्रक्रिया को बदलता है, जिसका प्रभाव हजारों किलोमीटर दूर स्थित क्षेत्रों के मौसम पर भी पड़ सकता है।
अल नीनो के दौरान कुछ क्षेत्रों में सामान्य से अधिक बारिश हो सकती है, जबकि कुछ दूसरे क्षेत्रों में सूखे की स्थिति पैदा हो सकती है। इसी कारण वैज्ञानिक इसे वैश्विक मौसम प्रणाली को प्रभावित करने वाली महत्वपूर्ण जलवायु घटनाओं में शामिल करते हैं।
इस बार क्यों महत्वपूर्ण है अल नीनो?
इस बार अल नीनो को लेकर चिंता इसलिए बढ़ी है क्योंकि वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह आने वाले महीनों में बहुत मजबूत स्थिति में पहुंच सकता है।
यदि समुद्र की सतह का तापमान लंबे समय तक सामान्य से काफी अधिक रहता है, तो इसका असर वायुमंडलीय परिसंचरण पर भी मजबूत हो सकता है। इसके कारण कई देशों में तापमान और वर्षा के सामान्य पैटर्न में बदलाव आने की संभावना रहती है।
इसका मतलब यह नहीं है कि दुनिया के हर हिस्से में एक ही तरह का मौसम देखने को मिलेगा। कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक गर्मी बढ़ सकती है, तो कुछ जगहों पर भारी बारिश या बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है। वहीं कुछ अन्य क्षेत्रों में लंबे समय तक सामान्य से कम बारिश हो सकती है।
अत्यधिक गर्मी का बढ़ सकता है खतरा
अल नीनो की मजबूत स्थिति के दौरान वैश्विक तापमान पर भी असर पड़ सकता है। पहले से बढ़ते वैश्विक तापमान के बीच एक मजबूत अल नीनो स्थिति अत्यधिक गर्मी की घटनाओं को और गंभीर बना सकती है।
शहरों और घनी आबादी वाले क्षेत्रों में इसका प्रभाव अधिक महसूस हो सकता है। लंबे समय तक सामान्य से अधिक तापमान रहने पर बिजली की मांग बढ़ सकती है क्योंकि लोग कूलिंग और एयर-कंडीशनिंग का अधिक इस्तेमाल करते हैं।
अत्यधिक गर्मी का असर कृषि, जल संसाधन, ऊर्जा और दैनिक जीवन पर भी पड़ सकता है। खासकर ऐसे क्षेत्रों में जहां पहले से ही गर्मी और पानी की समस्या मौजूद है, वहां स्थिति अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
बाढ़ का भी बढ़ सकता है खतरा
अल नीनो का एक महत्वपूर्ण प्रभाव वर्षा के वितरण में बदलाव हो सकता है। कुछ क्षेत्रों में सामान्य से बहुत अधिक बारिश होने की संभावना बढ़ सकती है।
कम समय में अत्यधिक बारिश होने पर नदियों का जलस्तर तेजी से बढ़ सकता है और शहरी इलाकों में जलभराव की स्थिति पैदा हो सकती है। पहाड़ी क्षेत्रों में भारी वर्षा से भूस्खलन का खतरा भी बढ़ सकता है।
हालांकि किसी विशेष क्षेत्र में बाढ़ सीधे केवल अल नीनो के कारण होगी, ऐसा कहना सही नहीं होगा। स्थानीय मौसम प्रणालियां, मानसून, समुद्री परिस्थितियां और अन्य जलवायु कारक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
फिर भी अल नीनो जैसे बड़े वैश्विक जलवायु पैटर्न मौसम की परिस्थितियों को प्रभावित कर सकते हैं और इसलिए वैज्ञानिक इसके विकास पर लगातार नजर रखते हैं।
कुछ क्षेत्रों में सूखे की आशंका
जहां एक ओर कुछ हिस्सों में अत्यधिक बारिश हो सकती है, वहीं दुनिया के कुछ दूसरे क्षेत्रों में सूखे का खतरा बढ़ सकता है।
कम बारिश का सीधा असर कृषि और जल संसाधनों पर पड़ सकता है। यदि लंबे समय तक वर्षा सामान्य से कम रहती है तो जलाशयों और नदियों में पानी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
कृषि क्षेत्र में बारिश की कमी से फसलों की पैदावार प्रभावित होने की संभावना रहती है। इससे किसानों की आय के साथ-साथ खाद्य आपूर्ति पर भी असर पड़ सकता है।
इसी कारण सरकारें और मौसम विभाग अल नीनो जैसी जलवायु घटनाओं के पूर्वानुमान को गंभीरता से लेते हैं।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत के लिए अल नीनो का अध्ययन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि देश की अर्थव्यवस्था और कृषि व्यवस्था मानसून पर काफी निर्भर करती है।
हालांकि अल नीनो और भारतीय मानसून के बीच संबंध हर साल बिल्कुल एक जैसा नहीं होता, लेकिन ऐतिहासिक रूप से मजबूत अल नीनो परिस्थितियों को भारतीय मानसून में बदलाव से जोड़ा जाता रहा है।
भारत में वर्षा का वितरण कृषि उत्पादन, जलाशयों, बिजली उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है। इसलिए 2026-27 के मौसम के लिए अल नीनो की स्थिति पर मौसम वैज्ञानिकों की निगरानी महत्वपूर्ण बनी रहेगी।
यदि किसी क्षेत्र में बारिश कम होती है तो सिंचाई की जरूरत बढ़ सकती है। वहीं दूसरी ओर किसी क्षेत्र में अत्यधिक बारिश होने पर फसलों को नुकसान और बाढ़ की समस्या पैदा हो सकती है। ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 04 Sep 2026 20:22:25 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Piyush Raghuwanshi</dc:creator>
        <media:keywords>अल नीनो 2026, El Nino 2026, वैश्विक मौसम, जलवायु परिवर्तन, अत्यधिक गर्मी, बाढ़ का खतरा, सूखा, भारत मानसून</media:keywords>
    </item>
    <item>
        <title>ISRO ने EOS&amp;05 उपग्रह को सफलतापूर्वक लॉन्च किया, अंतरिक्ष में भारत की निगरानी क्षमता को मिली बड़ी मजबूती</title>
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        <description><![CDATA[ श्रीहरिकोटा, 4 सितंबर 2026 | भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने शुक्रवार तड़के भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की। श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से GSLV-F17 रॉकेट के जरिए EOS-05 पृथ्वी अवलोकन उपग्रह को सफलतापूर्वक लॉन्च किया गया। रॉकेट ने सुबह 2:55 बजे उड़ान भरी और लगभग 19 मिनट की यात्रा के बाद उपग्रह को उसकी निर्धारित सब-जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में स्थापित किया। यह मिशन भारत की पृथ्वी अवलोकन और अंतरिक्ष आधारित निगरानी क्षमताओं के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। GSLV-F17 की सफल उड़ान
GSLV-F17 भारत के Geosynchronous Satellite Launch Vehicle कार्यक्रम की 19वीं उड़ान है। लगभग 51.7 मीटर ऊंचे इस रॉकेट ने करीब 27.5 घंटे के काउंटडाउन के बाद श्रीहरिकोटा के सेकेंड लॉन्च पैड से उड़ान भरी। प्रक्षेपण के दौरान रॉकेट ने अपने तीन चरणों का इस्तेमाल करते हुए EOS-05 को निर्धारित कक्षा की दिशा में पहुंचाया।
GSLV भारत के महत्वपूर्ण भारी-उपग्रह प्रक्षेपण वाहनों में शामिल है। इसकी खासियत इसका स्वदेशी क्रायोजेनिक अपर स्टेज है, जो भारी उपग्रहों को जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट की दिशा में भेजने में सक्षम बनाता है। EOS-05 मिशन में इसी क्षमता का इस्तेमाल किया गया।
ISRO के अनुसार EOS-05 का वजन लगभग 2,367 किलोग्राम है। यह GSLV द्वारा प्रक्षेपित किए गए सबसे भारी पृथ्वी अवलोकन उपग्रहों में से एक है और इस मिशन की सफलता रॉकेट की क्षमता में हुई तकनीकी प्रगति को भी दर्शाती है। EOS-05 क्या है?
EOS-05 एक अत्याधुनिक Earth Observation Satellite है। इसका मुख्य उद्देश्य अंतरिक्ष से पृथ्वी की सतह की उच्च गुणवत्ता वाली तस्वीरें और महत्वपूर्ण भौगोलिक जानकारी उपलब्ध कराना है।
इस मिशन की सबसे खास बात यह है कि EOS-05 को जियोसिंक्रोनस कक्षा से पृथ्वी का अवलोकन करने के लिए तैयार किया गया है। आम तौर पर कई पृथ्वी अवलोकन उपग्रह पृथ्वी की निचली कक्षाओं में घूमते हैं और अलग-अलग समय पर किसी क्षेत्र के ऊपर से गुजरते हैं। इसके मुकाबले जियोसिंक्रोनस कक्षा में मौजूद उपग्रह पृथ्वी के घूर्णन के साथ तालमेल बनाए रखते हुए किसी खास क्षेत्र की लगातार निगरानी के लिए अधिक उपयोगी हो सकता है।
EOS-05 को लगभग 36,000 किलोमीटर की ऊंचाई वाली परिचालन कक्षा की दिशा में भेजा जाना है। इस तरह की कक्षा से किसी बड़े भौगोलिक क्षेत्र पर लगातार नजर रखना संभव होता है। प्राकृतिक आपदाओं की निगरानी में मदद
EOS-05 का सबसे महत्वपूर्ण उपयोग आपदा प्रबंधन में हो सकता है। भारत जैसे बड़े और भौगोलिक रूप से विविध देश में हर साल बाढ़, चक्रवात, भूस्खलन, जंगलों में आग और अन्य प्राकृतिक आपदाएं सामने आती हैं।
ऐसी परिस्थितियों में जमीन पर मौजूद टीमों के लिए पूरे प्रभावित क्षेत्र की तत्काल जानकारी हासिल करना मुश्किल हो सकता है। अंतरिक्ष से प्राप्त तस्वीरों और डेटा की मदद से प्रभावित क्षेत्रों की पहचान, स्थिति का आकलन और राहत-बचाव की योजना बनाने में सहायता मिल सकती है।
उदाहरण के तौर पर यदि किसी बड़े क्षेत्र में बाढ़ आती है, तो उपग्रह से प्राप्त तस्वीरों के जरिए यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि पानी किन इलाकों तक पहुंचा है, कौन से क्षेत्र ज्यादा प्रभावित हैं और किन इलाकों में राहत कार्यों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
इसी तरह चक्रवात के दौरान समुद्र और तटीय क्षेत्रों की निगरानी तथा आपदा के बाद हुए नुकसान का आकलन करने में भी पृथ्वी अवलोकन डेटा महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
कृषि क्षेत्र के लिए भी महत्वपूर्ण
EOS-05 से मिलने वाला पृथ्वी अवलोकन डेटा केवल आपदा प्रबंधन तक सीमित नहीं रहेगा। पृथ्वी अवलोकन उपग्रहों से मिलने वाली जानकारी का इस्तेमाल कृषि, जल संसाधन, वानिकी, पर्यावरण निगरानी और शहरी नियोजन जैसे क्षेत्रों में भी किया जाता है।
कृषि क्षेत्र में उपग्रह आधारित निगरानी के माध्यम से फसलों की स्थिति, भूमि के उपयोग और बड़े स्तर पर कृषि क्षेत्रों में होने वाले बदलावों का अध्ययन किया जा सकता है।
भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्वपूर्ण स्थान होने के कारण बेहतर पृथ्वी अवलोकन प्रणाली किसानों और नीति निर्माताओं के लिए उपयोगी जानकारी उपलब्ध कराने में मदद कर सकती है। लंबे समय में इस तरह के डेटा का इस्तेमाल कृषि योजना, जल प्रबंधन और प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल के लिए किया जा सकता है।
जल संसाधनों और पर्यावरण की निगरानी
भारत में नदियों, झीलों, जलाशयों और भूजल संसाधनों की निगरानी भी एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है। पृथ्वी अवलोकन उपग्रहों से प्राप्त जानकारी का इस्तेमाल जल संसाधनों से जुड़े बदलावों को समझने में किया जा सकता है।
इसी प्रकार जंगलों और पर्यावरण में होने वाले बदलावों पर भी नजर रखी जा सकती है। जंगलों के क्षेत्र में बदलाव, वनस्पति की स्थिति और बड़े स्तर पर पर्यावरणीय परिवर्तन का अध्ययन करने में उपग्रह आधारित डेटा वैज्ञानिकों और प्रशासन के लिए उपयोगी होता है।
शहरी क्षेत्रों में तेजी से बढ़ते निर्माण और बदलते भूमि उपयोग को समझने के लिए भी Earth Observation तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। इससे भविष्य की शहरी योजना तैयार करने में मदद मिल सकती है।
राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी उपयोगी
EOS-05 की एक अन्य महत्वपूर्ण विशेषता इसकी रणनीतिक उपयोगिता है। पृथ्वी की लगातार निगरानी करने की क्षमता किसी भी देश के लिए महत्वपूर्ण होती है।
उपग्रह से प्राप्त तस्वीरों और डेटा का इस्तेमाल सीमावर्ती क्षेत्रों तथा महत्वपूर्ण रणनीतिक स्थानों की निगरानी में किया जा सकता है। इससे जमीन पर मौजूद एजेंसियों को व्यापक क्षेत्र की जानकारी प्राप्त करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि उपग्रह के कई उपयोग नागरिक और विकास संबंधी हैं, लेकिन इसकी उच्च स्तरीय पृथ्वी अवलोकन क्षमता भारत की समग्र अंतरिक्ष और रणनीतिक क्षमताओं को मजबूत करने वाली मानी जा रही है।
GSLV के लिए भी बड़ी उ ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 04 Sep 2026 20:15:03 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Piyush Raghuwanshi</dc:creator>
        <media:keywords>ISRO EOS-05, GSLV-F17, EOS-05 Launch, ISRO Launch 2026, पृथ्वी अवलोकन उपग्रह, भारत अंतरिक्ष मिशन, श्रीहरिकोटा लॉन्च</media:keywords>
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        <title>दिल्ली&amp;NCR में बारिश का दौर जारी, मौसम विभाग ने कई इलाकों में भारी बारिश की चेतावनी दी</title>
        <link>https://dhakarsamachar.in/दिल्ली-ncr-में-बारिश-का-दौर-जारी-मौसम-विभाग-ने-कई-इलाकों-में-भारी-बारिश-की-चेतावनी-दी</link>
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        <description><![CDATA[ नई दिल्ली, 28 अगस्त 2026। दिल्ली-एनसीआर में मानसून की सक्रियता के कारण बारिश का दौर जारी है। मौसम विभाग ने राजधानी और आसपास के इलाकों में अगले कुछ दिनों के दौरान बारिश की संभावना जताई है। कई हिस्सों में बारिश के कारण सड़कों पर पानी जमा होने और यातायात प्रभावित होने की स्थिति बनी हुई है।
कई इलाकों में जलभराव
राजधानी में हुई बारिश के बाद कई निचले इलाकों और प्रमुख सड़कों पर जलभराव की समस्या सामने आई। सुबह और शाम के व्यस्त समय में जलभराव के कारण वाहनों की रफ्तार धीमी हुई और कई मार्गों पर यातायात प्रभावित रहा।
नगर प्रशासन की टीमें जलभराव वाले स्थानों से पानी निकालने के लिए पंप और अन्य संसाधनों का इस्तेमाल कर रही हैं। लोगों को अनावश्यक रूप से जलभराव वाले रास्तों पर जाने से बचने की सलाह दी गई है।
मौसम विभाग ने जारी किया अलर्ट
मौसम विभाग के अनुसार दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में मानसूनी गतिविधियां बनी हुई हैं। अगले कुछ दिनों में अलग-अलग स्थानों पर हल्की से मध्यम बारिश हो सकती है, जबकि कुछ इलाकों में तेज बारिश की संभावना है।
बारिश के साथ तेज हवाएं और बिजली चमकने जैसी स्थितियां भी बन सकती हैं। मौसम विभाग ने लोगों को खराब मौसम के दौरान खुले स्थानों और पेड़ों के नीचे खड़े होने से बचने की सलाह दी है।
यातायात पर पड़ा असर
बारिश और जलभराव का सीधा असर दिल्ली-एनसीआर के यातायात पर भी दिखाई दिया। कई प्रमुख मार्गों पर वाहनों की गति धीमी रही। कार्यालय जाने वाले लोगों और स्कूल-कॉलेज जाने वाले विद्यार्थियों को भी कुछ स्थानों पर परेशानी का सामना करना पड़ा।
यातायात पुलिस और स्थानीय प्रशासन ने जलभराव वाले इलाकों में निगरानी बढ़ाई है। लोगों को मौसम और यातायात की स्थिति को ध्यान में रखते हुए यात्रा की योजना बनाने की सलाह दी गई है।
एनसीआर के अन्य शहर भी प्रभावित
दिल्ली के साथ नोएडा, गाजियाबाद, गुरुग्राम और फरीदाबाद के कुछ हिस्सों में भी बारिश का असर देखने को मिला। कई स्थानों पर सड़क किनारे पानी जमा होने से यातायात व्यवस्था प्रभावित हुई।
एनसीआर के कुछ क्षेत्रों में तेज बारिश के कारण स्थानीय प्रशासन को जलनिकासी व्यवस्था पर विशेष ध्यान देना पड़ा। लगातार बारिश होने की स्थिति में निचले इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए परेशानी और बढ़ सकती है।
लोगों से सतर्क रहने की अपील
प्रशासन ने लोगों से मौसम संबंधी चेतावनियों का पालन करने और जरूरी होने पर ही यात्रा करने की अपील की है। वाहन चालकों को जलभराव वाली सड़कों पर सावधानी से वाहन चलाने की सलाह दी गई है।
मौसम विभाग की निगरानी के अनुसार आने वाले दिनों में बारिश का दौर जारी रह सकता है। ऐसे में दिल्ली-एनसीआर के लोगों को स्थानीय मौसम अपडेट पर नजर रखने की सलाह दी गई है। ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 29 Aug 2026 10:27:14 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Piyush Raghuwanshi</dc:creator>
        <media:keywords>दिल्ली बारिश, दिल्ली मौसम, एनसीआर बारिश, मौसम विभाग अलर्ट, जलभराव 2026</media:keywords>
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    <item>
        <title>इसरो ने अगले पृथ्वी अवलोकन उपग्रह मिशन की तैयारियां तेज कीं</title>
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        <description><![CDATA[ बेंगलुरु। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने अपने अगले पृथ्वी अवलोकन उपग्रह मिशन की तैयारियों को तेज कर दिया है। यह उपग्रह उच्च-रिज़ॉल्यूशन कैमरों और आधुनिक रिमोट सेंसिंग तकनीक से लैस होगा, जिससे मौसम पूर्वानुमान, कृषि निगरानी, जल संसाधन प्रबंधन तथा प्राकृतिक आपदाओं की बेहतर निगरानी संभव होगी।

इसरो के वैज्ञानिकों के अनुसार मिशन का उद्देश्य देश को अधिक सटीक भू-स्थानिक डेटा उपलब्ध कराना है, जिससे बाढ़, सूखा और भूस्खलन जैसी आपदाओं के दौरान राहत एवं बचाव कार्यों में तेजी लाई जा सके। इसके अलावा किसानों को फसल की स्थिति और भूमि उपयोग से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी भी प्राप्त होगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह मिशन भारत की अंतरिक्ष तकनीक को नई मजबूती देगा और पर्यावरण संरक्षण, स्मार्ट कृषि तथा राष्ट्रीय विकास योजनाओं में महत्वपूर्ण योगदान निभाएगा। ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 17 Aug 2026 07:02:17 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Piyush Raghuwanshi</dc:creator>
        <media:keywords>: ISRO, सैटेलाइट, पृथ्वी अवलोकन, अंतरिक्ष मिशन, भारत समाचार</media:keywords>
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    <item>
        <title>भारत की सौर ऊर्जा क्षमता का करीब 7% पूरी क्षमता से नहीं हो पा रहा इस्तेमाल, ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर बनी चुनौती</title>
        <link>https://dhakarsamachar.in/india-solar-capacity-transmission-infrastructure-7-percent-july-2026</link>
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        <description><![CDATA[ भारत ने पिछले कुछ वर्षों में सौर ऊर्जा के क्षेत्र में तेजी से विस्तार किया है। देश में सौर ऊर्जा उत्पादन क्षमता लगातार बढ़ रही है और सरकार भी Renewable Energy को बढ़ावा देने पर जोर दे रही है। लेकिन अब एक महत्वपूर्ण चुनौती सामने आई है। 29 जुलाई 2026 तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, भारत की लगभग 7% सौर ऊर्जा क्षमता को पीक उत्पादन के घंटों में पूरी क्षमता से इस्तेमाल नहीं किया जा पा रहा है। इसका प्रमुख कारण पर्याप्त ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर का उपलब्ध नहीं होना बताया गया है।

इस समस्या का सीधा संबंध देश में बढ़ती Renewable Energy Capacity और उसे बिजली ग्रिड तक पहुंचाने की क्षमता से है। सौर ऊर्जा संयंत्रों से बिजली का उत्पादन मुख्य रूप से दिन के समय होता है और दोपहर के आसपास उत्पादन काफी बढ़ जाता है। ऐसे समय में यदि Transmission Network पर्याप्त मजबूत नहीं हो, तो उपलब्ध बिजली को पूरी तरह ग्रिड में भेजना मुश्किल हो जाता है।

बढ़ती सौर क्षमता के साथ बढ़ी इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत

भारत ने Renewable Energy को अपनी ऊर्जा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया है। सौर ऊर्जा संयंत्रों की स्थापना देश के अलग-अलग हिस्सों में तेजी से हुई है। इसका उद्देश्य जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करना और स्वच्छ ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़ाना है।

लेकिन केवल Solar Power Plants स्थापित करना पर्याप्त नहीं है। उनसे पैदा होने वाली बिजली को उन क्षेत्रों तक पहुंचाने के लिए जहां उसकी मांग है, मजबूत Transmission Network की जरूरत होती है। खासकर राजस्थान और गुजरात जैसे राज्यों में जहां बड़े पैमाने पर Solar Projects स्थापित किए गए हैं, वहां से बिजली को दूसरे राज्यों तक पहुंचाने के लिए पर्याप्त ट्रांसमिशन क्षमता आवश्यक है।

7% क्षमता का पूरा इस्तेमाल क्यों नहीं हो रहा?

सौर ऊर्जा उत्पादन दिन के दौरान मौसम और सूर्य की रोशनी पर निर्भर करता है। जब धूप तेज होती है, तब Solar Plants बड़ी मात्रा में बिजली पैदा कर सकते हैं। लेकिन यदि उसी समय Transmission Network में पर्याप्त क्षमता उपलब्ध नहीं होती, तो पूरी बिजली को ग्रिड में भेजना संभव नहीं होता।

इसे आसान भाषा में ऐसे समझा जा सकता है कि देश के पास बिजली बनाने की क्षमता तो है, लेकिन उस बिजली को वहां तक पहुंचाने के लिए पर्याप्त &quot;रास्ता&quot; नहीं है। यही कारण है कि उपलब्ध Solar Capacity का एक हिस्सा Peak Generation Hours में पूरी क्षमता से इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है।

Renewable Energy के लिए Storage भी महत्वपूर्ण

इस चुनौती का एक समाधान Energy Storage Systems को बढ़ावा देना भी हो सकता है। Solar Power का उत्पादन मुख्य रूप से दिन में होता है, जबकि बिजली की मांग पूरे दिन बनी रहती है। Battery Energy Storage Systems के जरिए दिन में अतिरिक्त बिजली को स्टोर करके बाद में इस्तेमाल किया जा सकता है।

हालांकि बड़े पैमाने पर Energy Storage Infrastructure विकसित करना महंगा हो सकता है। इसके लिए तकनीकी निवेश, मजबूत Grid Management और बेहतर Planning की जरूरत होगी।

Transmission Network को मजबूत करने की आवश्यकता

भारत में Renewable Energy Capacity बढ़ने के साथ Transmission Infrastructure पर भी समान गति से निवेश करना जरूरी हो गया है। यदि नई Solar और Wind Capacity लगातार जुड़ती रही लेकिन बिजली को स्थानांतरित करने की क्षमता उसी अनुपात में नहीं बढ़ी, तो भविष्य में ऐसी समस्याएं और बढ़ सकती हैं।

इसलिए Energy Sector के विशेषज्ञों के सामने अब केवल यह सवाल नहीं है कि भारत कितनी Renewable Energy Capacity स्थापित कर सकता है, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण है कि उस क्षमता से पैदा होने वाली बिजली को कितनी कुशलता से Grid में शामिल किया जा सकता है।

राज्यों के बीच बिजली पहुंचाने की चुनौती

भारत में Renewable Energy Resources सभी राज्यों में समान रूप से उपलब्ध नहीं हैं। जिन राज्यों में तेज धूप और बड़े भू-भाग उपलब्ध हैं, वहां Solar Projects स्थापित करना अपेक्षाकृत आसान होता है। लेकिन बिजली की बड़ी मांग देश के दूसरे हिस्सों में हो सकती है।

इस स्थिति में Inter-State Transmission Network की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। राजस्थान या गुजरात में पैदा हुई अतिरिक्त Solar Power को दूसरे राज्यों तक पहुंचाने के लिए मजबूत राष्ट्रीय और क्षेत्रीय बिजली ग्रिड की आवश्यकता होती है।

भारत के Clean Energy लक्ष्य पर असर

भारत ने Renewable Energy को बढ़ावा देकर अपने Clean Energy और Climate Goals की दिशा में आगे बढ़ने का लक्ष्य रखा है। Solar Energy इस रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

लेकिन यदि स्थापित Solar Capacity का एक हिस्सा नियमित रूप से पूरी क्षमता से इस्तेमाल नहीं हो पाता है, तो इससे निवेश की दक्षता प्रभावित हो सकती है। इसलिए आने वाले वर्षों में Renewable Energy Projects के साथ Transmission और Storage Infrastructure को भी समान प्राथमिकता देना जरूरी होगा।

आगे क्या किया जाना चाहिए?

भारत के सामने अब तीन प्रमुख जरूरतें दिखाई देती हैं—नई Transmission Lines का निर्माण, Existing Grid को मजबूत करना और Energy Storage Capacity बढ़ाना।

इसके साथ ही Renewable Energy Projects की Planning करते समय Transmission Availability को पहले से ध्यान में रखना महत्वपूर्ण होगा। इससे ऐसे क्षेत्रों में अत्यधिक क्षमता स्थापित होने से बचा जा सकता है जहां बिजली को Grid तक पहुंचाने की पर्याप्त व्यवस्था अभी मौजूद नहीं है।

निष्कर्ष

भारत के Renewable Energy Sector के लिए सौर ऊर्जा क्षमता में तेजी से वृद्धि निश्चित रूप से सकारात्मक उपलब्धि है। लेकिन करीब 7% Solar Capacity का Peak Hours में पूरी क्षमता से इस्तेमाल नहीं हो पाना यह दिखाता है कि केवल उत्पादन क्षमता बढ़ाना पर्याप्त नहीं है।

देश को अब Solar Projects के साथ-साथ Transmission Infrastructure, Grid Moder ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 31 Jul 2026 10:12:04 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Piyush Raghuwanshi</dc:creator>
        <media:keywords>भारत सौर ऊर्जा 2026, Solar Energy India, Solar Power Capacity India, Renewable Energy News, Transmission Infrastructure, Green Energy India, Solar Power News Hindi</media:keywords>
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