रुपये पर तेल कीमतों का दबाव, RBI की लिक्विडिटी नीति पर बाजार की नजर
भारतीय रुपया सोमवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार की परिस्थितियों और घरेलू वित्तीय संकेतकों के बीच दबाव में रहा। बाजार प्रतिभागियों की नजर मुख्य रूप से कच्चे तेल की कीमतों, विदेशी पोर्टफोलियो निवेश और भारतीय रिजर्व बैंक की लिक्विडिटी प्रबंधन नीति पर रही। Reuters के अनुसार, रुपये ने पिछले सप्ताह डॉलर के मुकाबले 95.8725 का स्तर देखा था। भारत के लिए कच्चे तेल की कीमतें महत्वपूर्ण हैं क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के एक बड़े हिस्से के लिए आयात पर निर्भर है। तेल महंगा होने पर आयात बिल बढ़ सकता है और इससे डॉलर की मांग पर असर पड़ सकता है। मौजूदा समय में वैश्विक ऊर्जा बाजार और पश्चिम एशिया से जुड़े घटनाक्रमों के कारण तेल की कीमतों पर बाजार की नजर बनी हुई है। दूसरी ओर, विदेशी पोर्टफोलियो निवेश से रुपये को कुछ समर्थन मिल सकता है। हालांकि, आयातकों की डॉलर मांग और तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव रुपये की चाल को प्रभावित कर सकते हैं। बाजार विश्लेषकों ने इस सप्ताह रुपये के लिए लगभग 95.30 से 96.00 प्रति डॉलर का संभावित ट्रेडिंग दायरा बताया था। RBI की लिक्विडिटी नीति भी बाजार के लिए महत्वपूर्ण रही। Reuters के मुताबिक, केंद्रीय बैंक ने बैंकिंग प्रणाली में मौजूद अतिरिक्त नकदी को कम करने के लिए सरकारी बॉन्ड की बिक्री की है। पिछले सप्ताह RBI ने 500 अरब रुपये मूल्य के बॉन्ड की बिक्री की थी और आगे भी बॉन्ड बिक्री की योजना थी। बैंकिंग प्रणाली में अतिरिक्त नकदी रहने से अल्पकालिक ब्याज दरों पर असर पड़ सकता है। RBI की ओर से लिक्विडिटी को नियंत्रित करने का उद्देश्य वित्तीय प्रणाली में नकदी की स्थिति को मौद्रिक नीति के अनुरूप रखना है। आने वाले दिनों में बाजार की नजर RBI के अगले कदम और घरेलू आर्थिक आंकड़ों पर रहेगी। इसके अलावा सितंबर के विनिर्माण और सेवा क्षेत्र के प्रारंभिक PMI आंकड़े भी बाजार के लिए महत्वपूर्ण होंगे। ये आंकड़े भारतीय अर्थव्यवस्था में कारोबारी गतिविधियों की मौजूदा स्थिति का संकेत देंगे। कुल मिलाकर, 21 सितंबर को रुपये की दिशा पर घरेलू और वैश्विक दोनों कारकों का प्रभाव रहा। तेल की कीमतें, विदेशी निवेश, डॉलर की मांग और RBI की लिक्विडिटी नीति आने वाले दिनों में रुपये तथा बॉन्ड बाजार के प्रमुख संकेतकों में शामिल रहेंगे।
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