45 बिजली संयंत्रों में कोयले का स्टॉक गंभीर स्तर पर, मानसून से आपूर्ति प्रभावित

नई दिल्ली, 27 अगस्त 2026। देश के बिजली क्षेत्र के सामने कोयले की आपूर्ति को लेकर नई चुनौती सामने आई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 25 अगस्त तक देश के 45 कोयला आधारित बिजली संयंत्रों में कोयले का भंडार गंभीर रूप से कम हो गया था। जुलाई के अंत में ऐसे संयंत्रों की संख्या 31 थी। यानी करीब एक महीने के भीतर कम स्टॉक वाले बिजली संयंत्रों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। भारी बारिश से कोयला आपूर्ति प्रभावित कोयले के स्टॉक में कमी का सबसे बड़ा कारण देश के प्रमुख कोयला उत्पादक राज्यों में हुई भारी बारिश को माना जा रहा है। ओडिशा, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में मानसून की तेज गतिविधियों के कारण खनन और कोयले के परिवहन पर असर पड़ा है। लगातार बारिश के कारण कई खदानों में काम प्रभावित हुआ है। इसके अलावा खदानों से बिजली संयंत्रों तक कोयला पहुंचाने के लिए इस्तेमाल होने वाली परिवहन व्यवस्था भी प्रभावित हुई है। इससे बिजली संयंत्रों को उनकी जरूरत के मुताबिक कोयला मिलने में देरी हो रही है। 40 संयंत्र घरेलू कोयले पर निर्भर गंभीर स्टॉक वाले 45 बिजली संयंत्रों में से 40 संयंत्र घरेलू स्तर पर उपलब्ध कराए जाने वाले कोयले पर निर्भर हैं। इसका मतलब है कि समस्या केवल आयातित कोयले की उपलब्धता से जुड़ी नहीं है, बल्कि घरेलू उत्पादन और परिवहन व्यवस्था भी इसका महत्वपूर्ण हिस्सा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश के बिजली संयंत्रों में उपलब्ध कोयले का कुल स्टॉक जुलाई के मुकाबले करीब 19 प्रतिशत कम हुआ है। मौजूदा स्टॉक लगभग 30.95 मिलियन टन बताया गया है, जो करीब 10 दिनों की बिजली उत्पादन जरूरत के बराबर है। एक महीने पहले यह स्टॉक लगभग 12 दिनों के संचालन के लिए पर्याप्त था। बिजली की मांग भी बनी हुई है चुनौती कोयले की आपूर्ति में कमी ऐसे समय सामने आई है जब बिजली की मांग पर भी दबाव बना हुआ है। मौसम संबंधी परिस्थितियों और कुछ क्षेत्रों में अपेक्षाकृत अधिक गर्मी के कारण लोगों द्वारा कूलिंग उपकरणों का इस्तेमाल बढ़ा है। रात के समय भी बिजली की मांग ऊंची रहने से बिजली उत्पादन कंपनियों पर अतिरिक्त दबाव बना हुआ है। यदि कोयले की आपूर्ति लंबे समय तक प्रभावित रहती है, तो बिजली संयंत्रों के लिए पर्याप्त ईंधन बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। एनटीपीसी को भी कम मिल रही कोयला आपूर्ति देश की सबसे बड़ी ताप विद्युत उत्पादक कंपनियों में शामिल एनटीपीसी को भी जरूरत के मुकाबले कम कोयला रेक मिलने की स्थिति सामने आई है। कोयला रेक के माध्यम से खदानों से बिजली संयंत्रों तक बड़ी मात्रा में कोयला पहुंचाया जाता है। परिवहन व्यवस्था में किसी भी तरह की बाधा का सीधा असर बिजली संयंत्रों के स्टॉक पर पड़ता है। यही वजह है कि बिजली मंत्रालय की ओर से संयंत्रों और संबंधित एजेंसियों को स्थिति पर लगातार नजर रखने के निर्देश दिए गए हैं। कुछ संयंत्रों का रखरखाव टालने की सलाह कोयले की उपलब्धता सामान्य होने तक कुछ बिजली संयंत्रों को निर्धारित रखरखाव कार्य को आगे बढ़ाने की सलाह दी गई है। सामान्य परिस्थितियों में बिजली संयंत्रों का रखरखाव आवश्यक होता है, लेकिन बिजली की मांग और ईंधन आपूर्ति के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए कुछ कार्यों को उचित समय तक टालना जरूरी हो सकता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि उपलब्ध बिजली उत्पादन क्षमता का अधिकतम उपयोग किया जा सके और बिजली की मांग बढ़ने की स्थिति में उत्पादन प्रभावित न हो। बिजली व्यवस्था पर क्या होगा असर? फिलहाल कोयले की कमी का मतलब यह नहीं है कि देश में तुरंत बिजली संकट पैदा हो गया है। बिजली व्यवस्था कई स्रोतों पर निर्भर करती है, जिनमें कोयला, गैस, जल विद्युत, परमाणु ऊर्जा और नवीकरणीय ऊर्जा शामिल हैं। हालांकि, भारत की बिजली उत्पादन व्यवस्था में कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्रों की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसलिए लंबे समय तक कोयले की आपूर्ति बाधित रहने पर बिजली उत्पादन क्षमता पर दबाव बढ़ सकता है। सरकार के सामने चुनौती यह है कि मानसून के दौरान खनन और परिवहन में आने वाली बाधाओं के बावजूद बिजली संयंत्रों में पर्याप्त स्टॉक बनाए रखा जाए। आगे की स्थिति पर नजर अधिकारियों की प्राथमिकता कोयले की खदानों से बिजली संयंत्रों तक आपूर्ति को सामान्य करना है। बारिश की तीव्रता कम होने और परिवहन व्यवस्था में सुधार आने पर कोयले की आपूर्ति में भी सुधार की उम्मीद की जा रही है। फिलहाल बिजली मंत्रालय और संबंधित एजेंसियां संयंत्रों के कोयला स्टॉक, बिजली की मांग और रोजाना होने वाली आपूर्ति पर नजर बनाए हुए हैं। आने वाले दिनों में मानसून की स्थिति यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी कि कोयले का स्टॉक कितनी तेजी से सामान्य स्तर पर लौटता है।

Aug 29, 2026 - 11:15
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