आरबीआई पूरे 2026 में रेपो रेट स्थिर रख सकता है, विकास दर को प्राथमिकता मिलने के संकेत
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) पूरे वर्ष 2026 के दौरान अपनी प्रमुख नीतिगत ब्याज दर यानी रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर स्थिर रख सकता है। यह जानकारी अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी Reuters द्वारा कराए गए अर्थशास्त्रियों के सर्वेक्षण में सामने आई है। सर्वे में शामिल अधिकांश विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों और घरेलू आर्थिक चुनौतियों को देखते हुए आरबीआई फिलहाल ब्याज दरों में बदलाव नहीं करेगा। रॉयटर्स द्वारा 21 से 27 जुलाई के बीच कराए गए इस सर्वे में 72 अर्थशास्त्रियों की राय शामिल की गई। इनमें से 68 विशेषज्ञों ने अनुमान लगाया कि अगस्त की मौद्रिक नीति समीक्षा में भी रेपो रेट 5.25% पर ही बरकरार रहेगा, जबकि केवल चार विशेषज्ञों ने 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी की संभावना जताई। रेपो रेट स्थिर रखने के पीछे क्या कारण हैं? विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय दोहरी चुनौती का सामना कर रही है। एक ओर जून 2026 में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 4.38 प्रतिशत पर पहुंच गई है, जो आरबीआई के 4 प्रतिशत के लक्ष्य से ऊपर है। दूसरी ओर वैश्विक स्तर पर पश्चिम एशिया में जारी तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और अंतरराष्ट्रीय व्यापार से जुड़ी अनिश्चितताएं आर्थिक विकास पर दबाव बना रही हैं। ऐसे में ब्याज दर बढ़ाने से आर्थिक गतिविधियों पर अतिरिक्त असर पड़ सकता है। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि आरबीआई फिलहाल महंगाई और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाने की रणनीति अपना रहा है। यदि महंगाई नियंत्रित दायरे में रहती है और विकास दर पर दबाव बना रहता है, तो ब्याज दरों को स्थिर रखना अधिक उपयुक्त माना जाएगा। आम लोगों पर क्या होगा असर? यदि रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं होता है, तो अधिकांश बैंकों के होम लोन, कार लोन और अन्य ऋणों की ब्याज दरों में भी तत्काल कोई बड़ा बदलाव देखने को नहीं मिलेगा। जिन ग्राहकों के लोन रेपो रेट से जुड़े हैं, उनकी EMI फिलहाल लगभग समान रहने की संभावना है। इसके अलावा, बैंक अपनी जमा योजनाओं (Fixed Deposit) की ब्याज दरों में भी सीमित बदलाव कर सकते हैं। हालांकि यह निर्णय प्रत्येक बैंक अपनी व्यावसायिक रणनीति के अनुसार लेता है। वैश्विक परिस्थितियों का प्रभाव रिपोर्ट के अनुसार पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए प्रमुख जोखिम बने हुए हैं। यदि तेल की कीमतों में लगातार वृद्धि होती है तो इसका असर महंगाई और आयात लागत पर पड़ सकता है। इसी कारण आरबीआई स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है। रुपये की स्थिरता पर भी ध्यान हाल के दिनों में भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले दबाव में रहा। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार आरबीआई ने विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप कर रुपये को स्थिर रखने का प्रयास किया। इससे यह संकेत मिलता है कि केंद्रीय बैंक केवल ब्याज दरों के माध्यम से ही नहीं बल्कि अन्य वित्तीय उपायों के जरिए भी आर्थिक स्थिरता बनाए रखने की कोशिश कर रहा है। आगे क्या होगा? अब निवेशकों और बाजार की नजर आरबीआई की अगली मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक पर रहेगी। यदि महंगाई में अप्रत्याशित वृद्धि नहीं होती और वैश्विक परिस्थितियां अधिक खराब नहीं होतीं, तो विशेषज्ञों का अनुमान है कि केंद्रीय बैंक पूरे वर्ष 2026 में रेपो रेट को मौजूदा स्तर पर बनाए रख सकता है। हालांकि भविष्य के निर्णय पूरी तरह आने वाले आर्थिक आंकड़ों, महंगाई की दिशा और वैश्विक परिस्थितियों पर निर्भर करेंगे।
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